श्रमिक न्याय एवं सुरक्षा प्रकोष्ठ – Labour justice & safety Cell

हमारे संगठन में यह प्रकोष्ठ श्रमिको को सहयता एवं जानकारी उपलब्ध कराने हेतु बनाया गया है, अत: उन्हें सही जानकारी मिले इसके लिए सरकारी वेबसाईट पर जाना आवश्यक है सरकारी ओरिजिनल वेबसाईट के कुछ अंश केवल जनहित और परोपकार की भावनाओं से शेयर किये जा रहे है | स्पष्ट एवं जानकारी की सत्यता निम्नलिखित आधिकारिक वेबसाईट से प्राप्त करे | 

भारत के श्रम मंत्रालय के बारे में

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय भारत सरकार की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक है. रक्षा के लिए और सामान्य में श्रमिकों के हितों और जो गरीब का गठन, समाज के वंचितों और नुकसान वर्गों की रक्षा, विशेष रूप से, उच्च उत्पादन और उत्पादकता और के लिए एक स्वस्थ माहौल बनाने का काम करने के कारण संबंध में मंत्रालय की मुख्य जिम्मेदारी है विकास और व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण और रोजगार सेवाओं के समन्वय. सरकार का ध्यान भी कल्याण को बढ़ावा देने पर और श्रम शक्ति उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ मिलकर संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने, ध्यान केंद्रित है. इन उद्देश्यों के लिए और विभिन्न श्रम कानूनों, जो सेवा और श्रमिकों के रोजगार की शर्तों को विनियमित करने के अधिनियमन के कार्यान्वयन के माध्यम से प्राप्त किया जा मांग कर रहे हैं. राज्य सरकारों को भी विधान अधिनियमित करने के लिए, के रूप में श्रम समवर्ती सूची में भारत के संविधान के तहत एक विषय है सक्षम हैं. श्रम मंत्रालय की सरकारी आधिकारिक वेबसाईट की लिंक निचे दी गयी है

https://labour.gov.in/hi

प्राईवेट कंपनियों और फर्मो में उचित वेतन दिए जाने के सम्बन्ध में सचिन सर्वटे, राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय वंचित लोक मंच ने प्रधानमंत्री व देश के समस्त मुख्यमंत्री के नाम लिखा पत्र पोस्ट दिनांक 14-09-19
सेवा मे
माननीय प्रधानमंत्री महोदय जी
भारत सरकार, नई दिल्ली |
विषय : प्राईवेट नौकरी में नहीं दी जाने वाली पर्याप्त तनख्वाह के संदर्भ में |
महोदय जी,
उपरोक्त विषय में सविनय निवेदन इस प्रकार है कि आज कोई भी प्राईवेट कंपनी, प्राइवेट स्कूल या किसी भी प्राईवेट शॉप या जॉब पर कार्य करने वाले कर्मियो को 5,000-8,000 रु ही हर महीने ही दिए जाते हैं और इनसे 10 से 12 घण्टे काम लिया जाता है, जबकि सरकारी नौकरी के एक चपरासी को भी हर महीने लगभग 45,000 तक मिलते है और उसमे भी उन्हें सिर्फ 8 घंटे ड्यूटी ही करनी होती है ।
प्राईवेट मजदूरी करने वाले कार्मिक कहते है कि उन्हें भी 8 घंटे की ही ड्यूटी दी जानी चाहिए और अगर उन्हें 12 घंटे की ड्यूटी दी भी जाती है तो कम से कम तनख्वाह तो पर्याप्त मिले जिससे कि उनके बच्चे अच्छी स्कूल मे पढ़ सके । उन्हें 2 टाइम अच्छे से खाना खाने को मिल सके और अगर उनके परिवार में कोई बीमार हो जाए तो उनकी भी दवाई आ सके और अच्छे से ईलाज हो सके और वे लोग भी 10 साल जॉब करने के बाद कम से कम एक 100 गज का मकान खरीद सकें, जो की एक सरकारी जॉब वाला चपरासी 5 साल मे ले लेने में सक्षम होता है ।यह बड़ा ही गौरतलब है कि मात्र 6000 से 8,000 मासिक वेतन वाला ये सब कैसे कर सकता है |
अत: माननीय प्रधानमंत्री जी, आपसे मेरा अनुरोध है कि जो प्राइवेट संस्थाओं के वर्कर हैं उन पर भी आप ध्यानदे, उनको 6,000 से 8000/- नहीं बल्कि 20,000/- से 24,000/- तक वेतन मिले जो जिससे कि एक परिवार अपना गुजारा कर पाए । साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए की तनख्वाह अनिवार्य रूप से उनके बेंक खातो में ही जमा की जाए और ESI/PF का लाभ भी मिले | कई कार्मिको के अनपढ़ या नियमो की जानकारी न होने के कारण उनके ठेकेदार या कंपनी अधिकारी खाली रेवेन्यु टिकट पर हस्ताक्षर करवाकर कम वेतन देते है | यह तब होता है जब तनख्वाह नकद दी जाती है अत: तनख्वाह को ऑनलाइन खाते में डलवाना भी सुनिश्चित करवाया जाए | कृपया इस और ध्यान देकर कोई आवश्यक कदम उठाएंगे तो आपकी अति कृपा होगी । धन्यवाद !!
भवदीय
सचिन विष्णुदेव सर्वटे (9468564466)

प्रतिलिपि : आवश्यक कार्यवाही एवं सूचनार्थ :-
1. श्रीमान संतोष कुमार गंगवार, माननीय राज्यमंत्री श्रम एवं रोजगार मंत्रालय भारत सरकार, नई दिल्ली |
2.समस्त माननीय मुख्यमंत्री महोदय, भारत के समस्त राज्य |
3.सोशल मिडिया पर जनहित में प्रचारित |

पीएम-एसवाईएम

श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा 15-02-2019 को प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (पीएम-एसवाईएम) योजना लांच की गई थी  । अंतरिम बजट में घोषित इस योजना को मंत्रालय ने हाल ही में अधिसूचित किया है। देश के असंगठित क्षेत्र में 42 करोड़ श्रमिक काम करते हैं।

इस योजना के पात्र 18-40 वर्ष की आयु समूह के घर से काम करने वाले श्रमिक, स्ट्रीट वेंडर, मिड डे मील श्रमिक, सिर पर बोझ ढोने वाले श्रमिक, ईंट-भट्टा मजदूर, चर्मकार, कचरा उठाने वाले, घरेलू कामगार, धोबी, रिक्शा चालक, भूमिहीन मजदूर, खेतिहर मजदूर, निर्माण मजदूर, बीड़ी मजदूर, हथकरघा मजदूर, चमड़ा मजदूर, ऑडियो-वीडियो श्रमिक तथा इसी तरह के अन्य व्यवसाय के श्रमिक होंगे, जिनकी मासिक आय 15,000 रुपये प्रति महीने या उससे कम है। पात्र व्यक्ति नई पेंशन योजना (एनपीएस), कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) योजना या कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के लाभ के अंतर्गत कवर नहीं किए नहीं जाने चाहिए और उसे आयकर दाता नहीं होना चाहिए।

पीएम-एसवाईएम की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

(i)    न्यूनतम निश्चित पेंशनः पीएम-एसवाईएम के अंतर्गत प्रत्येक अभिदाता को 60 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद प्रति महीने 3,000 रुपये न्यूनतम निश्चित पेंशन मिलेगा।
(ii)   परिवार पेंशनः यदि पेंशन प्राप्ति के दौरान अभिदाता की मृत्यु होती है तो परिवार पेंशन के रूप में लाभार्थी को मिलने वाले पेंशन का 50 प्रतिशत लाभार्थी के जीवनसाथी को मिलेगा। परिवार पेंशन केवल जीवनसाथी के मामले में लागू होता है।
(iii)   यदि लाभार्थी ने नियमित अंशदान दिया है और किसी कारणवश उसकी मृत्यु (60 वर्ष की आयु से पहले) हो जाती है तो लाभार्थी का जीवनसाथी योजना में शामिल होकर नियमित अंशदान करके योजना को जारी रख सकता है या योजना से बाहर निकलने और वापसी के प्रावधानों के अनुसार योजना से बाहर निकल सकता है।

3. अभिदाता द्वारा अंशदानः अभिदाता का अंशदान उसके बचत बैंक खाता/जनधन खाता से “ऑटो डेबिट” सुविधा के माध्यम से किया जाएगा। पीएम-एसवाईएम योजना में शामिल होने की आयु से 60 वर्ष की आयु तक अभिदाता को निर्धारित अंशदान राशि देनी होगी। नीचे तालिका में प्रवेश आयु विशेष मासिक अंशदान का ब्यौरा दिया गया हैः

प्रवेश आयु योजना पूरी होने के समय आयु सदस्य का मासिक अंशदान (रुपये में) केन्द्र सरकार का मासिक अंशदान (रुपये में) कुल मासिक अंशदान (रुपये में)
(1) (2) (3) (4) (5)= (3)+(4)
18 60 55 55 110
19 60 58 58 116
20 60 61 61 122
21 60 64 64 128
22 60 68 68 136
23 60 72 72 144
24 60 76 76 152
25 60 80 80 160
26 60 85 85 170
27 60 90 90 180
28 60 95 95 190
29 60 100 100 200
30 60 105 105 210
31 60 110 110 220
32 60 120 120 240
33 60 130 130 260
34 60 140 140 280
35 60 150 150 300
36 60 160 160 320
37 60 170 170 340
38 60 180 180 360
39 60 190 190 380
40 60 200 200 400

4. केन्द्र सरकार द्वारा बराबर का अंशदानः पीएम-एसवाईएम 50:50 के अनुपात आधार पर एक स्वैच्छिक तथा अंशदायी पेंशन योजना है, जिसमें निर्धारित आयु विशेष अंशदान लाभार्थी द्वारा किया जाएगा और तालिका के अनुसार बराबर का अंशदान केन्द्र सरकार द्वारा किया जाएगा। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति 29 वर्ष की आयु का होता है तो उसे 60 वर्ष की आयु तक प्रति महीने 100 रुपये का अंशदान करना होगा। केन्द्र सरकार द्वारा बराबर का यानी 100 रुपये का अंशदान किया जाएगा।

5.पीएम-एसवाईएम योजना के अंतर्गत नामांकनःअभिदाता के पास मोबाइल फोन, बचत बैंक खाता तथा आधार संख्या होना अनिवार्य है। पात्र अभिदाता नजदीकी सीएससी जाकर आधार नम्बर तथा बचत बैंक खाता/जनधन खाता संख्या को स्वप्रमाणित करके पीएम-एसवाईएम के लिए नामांकन करा सकते हैं।
बाद में अभिदाता को पीएम-एसवाईएम वेब पोर्टल पर जाने तथा मोबाइल ऐप डाउनलोड करने की सुविधा दी जाएगी और अभिदाता आधार संख्या /स्वप्रमाणित आधार पर बचत बैंक खाता / जनधन खाता का इस्तेमाल करते हुए अपना पंजीकरण करा सकते हैं।

6. नामांकन एजेंसियां: नामांकन कार्य सामुदायिक सेवा केन्द्रों (सीएससी) द्वारा चलाया जाएगा। असंगठित श्रमिक आधार कार्ड तथा बचत बैंक खाता, पासबुक/जनधन खाता के साथ नजदीकी सीएससी जाकर योजना के लिए अपना पंजीकरण करा सकते हैं। पहले महीने की अंशदान राशि का भुगतान नकद रूप में होगा और इसकी रसीद दी जाएगी।

7.सहायता केन्द्रः एलआईसी के सभी शाखा कार्यालयों, ईएसआईसी/ईपीएफओ के कार्यालयों तथा केन्द्र तथा राज्य सरकारों के सभी श्रम कार्यालयों द्वारा असंगठित श्रमिकों को योजना, उसके लाभों तथा प्रक्रियाओं के बारे में बताया जाएगा।
इस संबंध में एलआईसी, ईएसआईसी, ईपीएफओ के सभी कार्यालयों तथा केन्द्र और राज्य सरकारों के सभी श्रम कार्यालयों द्वारा निम्नलिखित प्रबंध किए जाएंगे:

1.  एलआईसी, ईपीएफओ/ईएसआईसी के सभी कार्यालयों तथा केन्द्र तथा राज्यों के श्रम कार्यालय असंगठित श्रमिकों की सहायता के लिए सहायता केन्द्र बनाएंगे, योजना की विशेषताओं की जानकारी के बारे में निर्देशित करेंगे और श्रमिकों को नजदीकी सीएससी भेजेंगे।
2.  प्रत्येक सहायता डेस्क पर कम से कम एक कर्मचारी होगा।
3.  सहायता डेस्क मुख्य द्वार पर होगा और डेस्क के पास असंगठित मजदूरों को जानकारी देने के लिए हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में पर्याप्त संख्या में विवरण पुस्तिका होगी।
4.  असंगठित श्रमिक आधार कार्ड, बचत बैंक खाता/जनधन खाता तथा मोबाइल फोन के साथ सीएससी जाएंगे।
5.  सहायता डेस्क के पास श्रमिकों के बैठने की तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं होंगी।
6.  योजना के बारे में असंगठित श्रमिकों की सहायता के लिए अन्य उपाय।

8.कोष प्रबंधनः पीएम-एसवाईएम केन्द्र की योजना है, जिसका संचालन श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा किया जाएगा तथा भारतीय जीवन बीमा निगम और सीएससी के माध्यम से लागू किया जाएगा। एलआईसी पेंशन फंड मैनेजर होगी और पेंशन भुगतान के लिए उत्तरदायी होगी। पीएम-एसवाईएम पेंशन योजना के अंतर्गत एकत्रित राशि का निवेश भारत सरकार द्वारा निर्दिष्ट निवेश तरीकों के अनुसार किया जाएगा।

9.योजना से बाहर निकलना और वापसीः असंगठित मजदूरों के रोजगार के अनिश्चित स्वभाव को देखते हुए योजना से बाहर निकालने के प्रावधान लचीले रखे गए हैं। योजना से बाहर निकलने के प्रावधान निम्नलिखित हैं:
(i)  यदि अभिदाता 10 वर्ष से कम की अवधि में योजना से बाहर निकलता है तो उसे केवल लाभार्थी के अंशदान के हिस्से को बचत बैंक ब्याज दर के साथ दिया जाएगा।
(ii)  यदि अभिदाता 10 वर्षों या उससे अधिक की अवधि के बाद लेकिन 60 वर्ष की आयु होने से पहले योजना से बाहर निकलता है तो उसे लाभार्थी के अंशदान के हिस्से के साथ कोष द्वारा अर्जित संचित ब्याज के साथ या बचत बैंक ब्याज, दर जो भी अधिक हो, के साथ दिया जाएगा।
(iii)  यदि लाभार्थी ने नियमित अंशदान किया है और किसी कारणवश उसकी मृत्यु हो जाती है तो उसका जीवनसाथी नियमित अंशदान करके इस योजना को आगे जारी रख सकता है या कोष द्वारा अर्जित एकत्रित वास्तविक ब्याज या बचत बैंक ब्याज दर, जो भी अधिक हो, के साथ लाभार्थी का अंशदान लेकर योजना से बाहर निकल सकता है।
(iv)  यदि लाभार्थी ने नियमित अंशदान किया है और 60 वर्ष की आयु से पहले किसी कारणवश से स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाता है और योजना के अंतर्गत अंशदान करने में अक्षम होता है तो उसका जीवनसाथी नियमित अंशदान करके इस योजना को आगे जारी रख सकता है या कोष द्वारा अर्जित एकत्रित वास्तविक ब्याज या बचत बैंक ब्याज दर, जो भी अधिक हो, के साथ लाभार्थी का अंशदान प्राप्त कर योजना से बाहर निकल सकता है।
(v)  अभिदाता और उसके जीवनसाथी दोनों की मृत्यु के बाद संपूर्ण राशि कोष में जमा करा दी जाएगी।
(vi)  एनएसएसबी की सलाह पर सरकार द्वारा तय योजना से बाहर निकलने का कोई अन्य प्रावधान।

11. अंशदान में चूकः यदि अभिदाता ने निरंतर रूप से अपने अंशदान का भुगतान नहीं किया है तो उसे सरकार द्वारा निर्धारित दंड राशि के साथ पूरी बकाया राशि का भुगतान करके अंशदान को नियमित करने की अनुमति होगी।

12.पेंशन भुगतानः18-40 वर्ष की प्रवेश आयु पर योजना में शामिल होने से 60 वर्ष की उम्र की प्राप्ति तक लाभार्थी को अंशदान करना होगा। 60 वर्ष की उम्र की प्राप्ति पर अभिदाता को परिवार पेंशन लाभ के साथ प्रति महीने 3000 रुपये का निश्चित मासिक पेंशन प्राप्त होगा।

13.संदेह तथा स्पष्टीकरणः योजना को लेकर किसी तरह के संदेह की स्थिति में जेएस एंड डीजीएलडब्ल्यू द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण अंतिम होगा।

https://labour.gov.in/hi/pm-sym-hindi

 

नागरिक/ग्राहक चार्टर

श्रम मंत्रालय के संगठन

श्रम कल्याण

क्र.सं. शीर्षक डाउनलोड
1 असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 डाउनलोड(3.88 MB)
2 ब‎न्धित श्रम पद्ध‎ति (उत्सादन) अ‎धिनियम,1976 डाउनलोड(0.32 MB)
3 सिनेमा कर्मकार एवं ‎सिनेमा ‎थियेटर कर्मकार (नियोजन का ‎विनियमन) अ‎धिनियम,1981 डाउनलोड(1.35 MB)
4 अंतर-रा‎ज्यिक प्रवासी कर्मकार (‎नियोजन का ‎विनियमन और सेवा शर्तें) अ‎धिनियम,1979 डाउनलोड(2.59 MB)
5 ठेका श्रम (‎विनियमन एवं उत्सादन) अ‎धिनियम,1970 डाउनलोड(0.89 MB)
6 भवन एवं अन्य स‎न्निर्माण कामगार (रोजगार का ‎विनियमन एवं सेवा शर्तें) अ‎धिनियम,1996 डाउनलोड(2.49 MB)
7 बीड़ी तथा ‎सिगार कर्मकार (‎नियोजन की शर्तें) अ‎धिनियम,1966 डाउनलोड(4.14 MB)
8 सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 डाउनलोड(0.92 MB)
9 सिनेमा कर्मकार कल्याण (उपकर) अ‎धिनियम,1981 डाउनलोड(0.59 MB)
10 सिनेमा कर्मकार कल्याण ‎निधि अ‎धिनियम,1981 डाउनलोड(0.59 MB)

बाल एवं म‎हिला श्रम

क्र.सं. शीर्षक डाउनलोड
1 बालक और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 को लागू करने के लिए मानक प्रचालन प्रक्रिया (SOP) डाउनलोड(2.09 MB)
2 समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 डाउनलोड(0.12 MB)
3 बाल श्रम (प्र‎तिषेध एवं ‎विनियमन) अ‎धिनियम,1986 डाउनलोड(2.44 MB)

औद्योगिक संबंध

क्र.सं. शीर्षक डाउनलोड
1 व्यवसाय संघ अ‎धिनियम,1926 डाउनलोड(0.10 MB)
2 औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 डाउनलोड(0.10 MB)
3 औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 डाउनलोड(0.02 MB)
4 बागान श्रम अ‎धिनियम,1951 डाउनलोड(0.94 MB)

न्यूनतम वेतन

क्र.सं. शीर्षक डाउनलोड
1 बोनस संदाय अ‎धिनियम,1965 डाउनलोड(6.23 MB) 
2 श्रमजीवी पत्रकार (मजदूरी दर नियतन) अधिनियम,1958 डाउनलोड(0.38 MB)
3 न्यूनतम मजदूरी अ‎धिनियम,1948 डाउनलोड(3.24 MB)
4 मजदूरी संदाय अ‎धिनियम,1936 डाउनलोड(4.76 MB)

सामाजिक सुरक्षा

क्र.सं. शीर्षक डाउनलोड
1 वैय‎क्तिक क्ष‎ति (प्र‎तिकर बीमा) अ‎धिनियम,1963 डाउनलोड(0.80 MB)
2 प्रसू‎ति प्रसु‎विधा अ‎धिनियम,1961 डाउनलोड(0.60 MB)
3 नियोजक दायित्व अधिनियम,1938 डाउनलोड(0.02 MB)
4 उपदान संदाय अ‎धिनियम, 1972 डाउनलोड(2.67 MB)
5 कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 डाउनलोड(5.43 MB)
6 कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 डाउनलोड(5.43 MB)
7 कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम,1948 डाउनलोड(0.02 MB)
8 कर्मकार प्र‎तिकर अ‎धिनियम,1923 डाउनलोड(0.02 MB)
9 वैयक्तिक क्षति (आपात उपलब्ध) अधिनियम, 1962 डाउनलोड(1.52 MB)
10 वैयक्तिक क्षति (आपात उपलब्ध) अधिनियम, 1962 डाउनलोड(1.52 MB)

सामान्य FAQ (fast asking questions)

प्रश्न 1। श्रम मंत्रालय का फैक्स नंबर क्या है?

उत्तर: फैक्स कोई 23718730 और 23355679 है

प्रश्न 2. श्रम मंत्रालय के अन्य वेबसाइटों क्या हैं?

उत्तर:

वेबसाइट विभाग
dget.nic.in रोजगार एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय
dgfasli.nic.in महानिदेशालय कारखाना सलाह सेवा और श्रम संस्थान
www.vvgnli.org वी.वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान
labourbureau.nic.in श्रम ब्यूरो
www.indialabourarchives.org  भारतीय श्रम
www.esicindia.org कर्मचारी राज्य बीमा निगम
www.epfindia.com कर्मचारी भविष्य निधि संगठन
www.dgmsindia.in/ महानिदेशालय खान सुरक्षा
labour.nic.in/cbwe श्रमिक शिक्षा सेंट्रल बोर्ड
labour.nic.in/mol/ महानिदेशालय श्रम कल्याण

ESI / PF सम्बन्धी महत्वपूर्ण नियम

कंपनियों के लिए ईपीएफ के लिए क़ानूनी प्रावधान क्या हैं?

कानून के नियमानुसार 20 या उससे अधिक वर्कर के काम करने वाले कंपनी को इसके तहत EPFO (Employee Provident Fund Organization) में पंजीकरण अनिवार्य है. एम्प्लॉयी प्रॉविडेंट फंड जिसे आमतौर पर ईपीएफ कहा जाता है. यह एक रिटायरमेंट स्कीम है. जब आप नौकरी ज्वाइन करते है तभी आपका कंपनी आपसे ईपीएफ का फार्म भरवाकर आपका खाता ईपीएफ ऑफिस में खोलता है. ईपीएफ खाते में एम्प्लॉयी और एम्प्लॉयर दोनों दोनों के द्वारा ही योगदान किया जाता है.

क्या ईपीएफ खाते में नॉमिनी का नाम रेजिस्टर्ड करवा सकते हैं?

आपकी मासिक सैलरी के बेसिक + डीए के कुल का 24 परसेंट हर महीने आपके ईपीएफ खाते में जमा होता है. आपके पीएफ खाते में आप अपने नॉमिनी का नाम रेजिस्टर्ड करवा सकते हैं. अगर किसी कारणवश पीएफ खाताधारक की मृत्यु हो जाए तो उस पैसा का हक़दार नॉमिनी हो जाता है. इस तरह से हर वर्कर को अपने खाते में अपने नॉमिनी का नाम रेजिस्टर्ड करवाना चाहिए, ताकि आगे कोई परेशानी न आये.

15 हजार रुपये मासिक से अधिक सैलरी वाले वर्कर के लिए ईपीएफ में क्या प्रावधान हैं?

अगर आपकी सैलरी (बेसिक सैलरी और डीए) 15 हजार रुपये मासिक या उससे कम है तो आपके लिए ईपीएफ खाता में रकम जमा करवाना अनिवार्य है. लाइव मिंट के अनुसार सरकार के द्वारा 21000/- रूपये सैलरी वाले को भी पीएफ का लाभ देने की बात चल रही है. फ़िलहाल के नियम के अनुसार अगर किसी का सैलरी (बेसिक सैलरी+डीए) 15 हजार रुपये महीना से अधिक हो गई है तो उनके पास ऑप्शन है कि वह ईपीएफ स्किम से बाहर आ सकता है. इसके बाद उनके बिना कुछ कटे पूरी सैलरी मिलेगी. मगर याद रहे इस अवस्था में केवल ईपीएफ का उनका हिस्सा मात्र 12 प्रतिशत जो कट रहा था, वही मिलेगा. मगर अगर इस ऑप्शन को चालू रखते है तो 24 प्रतिशत के हक़दार होते हैं. मगर बाहर होने का ऑप्शन तभी मिलता है जब आप कोई नई नौकरी की शुरुआत करते है. अगर आप एक बार ईपीएफ खाता खुल जाता है और इस स्कीम में शामिल हो जाते है और यदि उस दौरान आपकी सैलरी 15 हजार से ज्यादा होती है तो आप इस स्कीम से चाह कर भी बाहर नहीं आ सकते है.

ईपीएफ खाताधारको के लिए पेंशन स्कीम क्या है और पेंशन कब मिलता है?

अब इसके बारे में थोड़ा गहराई से जानते है. EPF और EPS जिसे हम ईपीएफ कहते हैं, वह दरअसल ईपीएफ और ईपीएस दो आइटमों का मिक्सचर है. ईपीएस का मतलब है एम्प्लॉयी पेंशन स्कीम. ईपीएफ में हमारे सैलरी का 12 प्रतिशत कटता है, वह पूरा का पूरा ईपीएफ में जमा होता है. जबकि कम्पनी यानी एम्प्लायर का जो 12 प्रतिशत योगदान होता है. उसमें से 8.33 फीसदी रकम पेंशन स्कीम यानी ईपीएस में जमा होता है और बाकी 3.67 फीसदी रकम ईपीएफ में जमा हो जाता है. ऐसे में अगर किसी वर्कर यानि एम्प्लॉईज़ की सैलरी अगर 15 हजार रूपये मासिक या उससे ज्यादा है तो उसके पेंसन में जमा होने वाली रकम 15 हजार रुपये के 8.33 फीसदी यानी 1250 रुपये महीना से ज्यादा नहीं हो सकता है. अब इस तरह से हम कह सकते है कि किसी भी वर्कर का अधिकतम 1250 रुपये महीना ही पेंशन स्कीम में जमा हो सकता है. यह याद रखे कि पेंशन आपको रिटायरमेंट यानि जब आपकी उम्र 58 साल हो जाएगी तब मिलेगा. इस पेंशन को पाने के लिए आपको एक या अलग-अलग कम्पनी के माध्यम से कम से कम 10 वर्ष का कंट्रीब्यूशन अनिवार्य होता है.

क्या ईपीएफ खाताधारको को इंश्योरेंस की भी सुविधा दी गई है?

ईपीएफ खाताधारक के लिए इंश्योरेंस की भी सुविधा दी गई है. अगर कोई कंपनी अपने एम्प्लॉयी को ग्रुप लाइफ इंश्योरेंस कवर मुहैया नहीं कर रही है, तो एम्प्लॉयी को ईपीएफ के जरिये छोटा सा लाइफ इंश्योरेंस दिया जाता है. इसके तहत कंपनी एम्प्लॉईजी डिपॉजिट लिंक्ड इंश्योरेंस यानी ईडीएलआई के जरिये देती है. इसके लिए एंप्लॉयर को एम्प्लॉयी की मंथली बेसिक पे का 0.5 फीसदी जमा करना होता है. यह रकम केंद्र सरकार की ओर से दी जाती है. बेसिक पे की कैप 15 हजार रुपये है. इस तरीके से मैक्सिमम लाइफ कवर 3.60 लाख रुपये ही मिल पाता है.

इसके बाद आपका सवाल यह होता है कि अगर आपकी सैलरी से पीएफ कट रहा तो इसका पता कैसे करेंगे कि कम्पनी उसको पीएफ ऑफिस में जमा कर रहा या नहीं? बिल्कुल सही और एकदम सटीक सवाल है. पहले तो कम्पनी के द्वारा हर 6 महीने पर कंट्रीब्यूशन जमा करने का प्रावधान था. जिसके बाद पता करना भी बहुत ही मुश्किल और जिसको देशी भाषा में जूते घिसने वाली बात कहते है वो थी. मगर अब पहले वाली बात नहीं रही. जब से यूएएन नंबर का प्रावधान हुआ है. यूएएन नंबर और इसके फायदे के बारे में जानने के लिए आप हमारा यह पोस्ट पढ़ सकते हैं -> EPF का UAN-यूनिवर्सल अकाउंट नंबर क्या है और इसके फायदे?. आपका एम्प्लॉयर कहिये, मालिक कहिये, ठेकेदार या कम्पनी, वह हर महीने आपके खाते में आपका और अपना हिस्से का पैसा ऑनलाइन जमा करता है. जिसके बाद आपके रेजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर मैसेज भी आ जाता है. इसके आलावा अपने पीएफ खाते का बैलेंस चेक कैसे करें इसके बार में जानने के लिए हमारा यह पोस्ट पढ़ें->अपने पीएफ खाते का बैलेंस कैसे चेक करें, जाने 7 तरीका. इसके साथ ही आप जान सकते है कि कितना पैसा कटा गया और कितना जमा किया गया. अगर आपका एम्प्लॉयर ज्यादा पैसा काट रहा और कम पैसे जमा कर रहा तो आप अपने सम्बंधित ईपीएफ कमिश्नर को सीधे शिकायत कर सकते है. इसके लिए कोई पैसा नहीं लगता है.

पीएफ कमिश्नर के पास शिकायत कैसे करेंगे? उससे पहले यह जान लेते हैं कि पीएफ कमिश्नर के पास किस-किस मुद्दे पर तुरंत ही शिकायत करना चाहिए.

  • अगर हर महीने आपके सैलरी से पीएफ की कटौती हो मगर एम्प्लायर आपके खाते में जमा नहीं करे.
  • अगर एम्प्लायर आपके खाते में कम राशि जमा कर रहा हो.
  • अगर एम्प्लायर अपना योगदान भी आपके ग्रॉस सैलरी से ही काट रहा हो.
  • अगर हर माह पीएफ कट रहा मगर ठेकेदार यूएएन व पीएफ नंबर की जानकारी नहीं दे रहा है. 
  • इत्यादि अन्य सभी…

दोस्तों, कई बार यह भी देखने को आना है कि कई कंपनियां या ठेकेदार अपने एम्प्लाइज के सैलरी से ही पीएफ का अपना योगदान काट कर पीएफ खाते में जमा करते रहते है. कर्मचारी को सैलरी स्ट्रक्चर या शिकायत कहां करें की जानकारी नहीं रहने के कारण चुप रहना पड़ता है. इस तरह के मामले के लिए जितनी जल्दी हो सके शिकायत करें. अब आप पूछियेगा कि यह कैसे पता चलेगा कि हमारे सैलरी से ही एम्पलॉईस और एम्प्लॉयर कंट्रीब्यूशन की कटौती हो रही है. बहुत ही सिंपल है, आपकी सैलरी Net Salary (Gross Salary) = Basic + Additions (bonuses, allowances) – Deductions होती है. यहां डिडक्शन मतलब आपके हिस्से की कटौती से है. इसके लिए आपको सैलरी स्ट्रक्चर की जानकारी बहुत जरुरी है. कोशिश करूँगा कि जल्दी ही इसके बारे में जानकारी उपलब्ध कराऊँ.

पीएफ का शिकायत करते समय किन-किन बातों का रखें ख्याल

इस तरह के कोई भी असुविधा हो तो तुरंत ही सादा कागज़ पर सेवा में पीएफ कमिश्नर, पता- और अपनी कंपनी और ठेकेदार यानी मान लीजिये कि आप दिल्ली मेट्रो या आईआरसीटीसी या अन्य किसी भी संस्था में ठेका वर्कर या आउटसोर्स वर्कर के रूप में काम करते है तो उन दोनों के ऑफिस का पूरा पता लिखे. अगर आपकी यूनियन है तो कोशिश करें कि यूनियन के माध्यम से ही शकायत करें और साथ में सभी पीड़ित वर्करों का लिस्ट लगायें. अगर यूनियन नहीं है तो आप अकेले भी शिकायत कर सकते है. शिकायत करते समय अगर कटौती का मामला हो तो आप अपने शिकायत पत्र में यह जिक्र जरुरी करें कि कुल कितने रूपये की गलत कटौती की गई है. अगर हो सके तो मंथली चार्ट के माध्यम से दर्शाना न भूलें. अपने शिकायत पत्र के साथ शिकायतकर्ता का सैलरी स्लिप अवश्य संलग्न करें, ताकि सम्बंधित अधिकारी को समझने में आसानी हो. इसके बाद अपनी समस्या को लिखकर नीचे अपने अपना पूरा नाम, पद, ऑफिस का पता, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी आदि के साथ लिख कर स्पीड पोस्ट या रजिस्टर्ड पोस्ट से भेज दें. याद रखे कभी भी साधारण डाक से न भेजें. अगर आप अपने एरिया का पीएफ ऑफिस सर्च करना चाहते है तो यहां क्लिक करें. इसके आलावा आप यहां क्लिक करके ऑनलाइन शिकायत भी दर्ज करा सकते है. अगर इस सम्बन्ध में कोई भी शिकायत या सुझाव हो तो तुरंत ही कमेंट बॉक्स में लिखें. कोशिश करूंगा कि जल्द से जल्द आपकी सहायता कर सकूं.

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लेखक: सुरजीत श्यामल

कांट्रैक्ट के आधार पर काम करने वाले इंप्लाइज पर मोदी सरकार का बढ़ता हमला

देश में सार्वजनिक क्षेत्र में 50 प्रतिशत और निजी क्षेत्र में 70 प्रतिशत ऐसे इंप्लाई हैं जो कांट्रैक्ट पर काम करते हैं। इन कांट्रै्क्ट कर्मियों यानि ठेका मजदूरों की हालत बेहद खराब है। 1990 के बाद ठेका मजदूरों को स्थायी काम में नियोजित करने और इसके जरिए अपने मुनाफे में बेइंतहा वृद्धि करने की दिशा में देश में कारपोरेट घराने बढ़े। कार्य की प्रकृति स्थायी होने के बाबजूद ठेका मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम की धारा 10 का उल्लंघन करते हुए इन कामों में ठेका मजदूरों को नियोजित किया जाता रहा। सरकार के संरक्षण में सारे श्रम कानूनों को दरकिनार कर यह प्रक्रिया चलायी गयी।

इन ठेका मजदूरों की मजदूरी बेहद कम है, उसमें भी न्यूनतम मजदूरी तक इन्हें नहीं मिलती। यहीं नहीं इनके हितों के लिए बने श्रम कानूनों का लाभ भी इन्हें नहीं प्राप्त होता है। मोदी सरकार के डेढ़ वर्ष के कार्यकाल में इन मजदूरों पर हमला और भी बढ़ा है। ‘मेक इन इंडिया’ और विदेशी दौरों के जरिए देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों को देश में पूंजी लगाने के लिए आकर्षित करने के लिए यह सरकार लम्बे संघर्षों द्वारा हासिल श्रमिकों के अधिकारों के खात्मे में लगी हुई है।

भाजपा की राजस्थान सरकार द्वारा ठेका मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम में संशोधन कर 20 की जगह 49 मजदूरों तक को काम पर रखने वाले ठेकेदारों को इस कानून के प्रावधान से बाहर करने के प्रस्ताव पर यह सरकार भी बढ़ चली है। इसका मतलब होगा कि अब इससे कम मजदूरों से काम कराने वाले ठेकेदारों को श्रम कार्यालय से पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी और इस प्रकार जो थोड़ा बहुत भी संरक्षण श्रम कार्यालय से ठेका श्रमिकों को प्राप्त होता था, वह भी उन्हें नहीं मिलेगा।

इतना ही नहीं सरकार ने अप्रेंटिसशिप एक्ट, कारखाना कानून और श्रम कानून (कुछ संस्थानों को विवरणी जमा करने तथा रजिस्टर तैयार करने में छूट) संशोधन अधिनियम 2011 पारित किया है। जहां अप्रेंटिसशिप एक्ट में संशोधन कर अब अप्रेंटिस के साथ ठेका मजदूर, कैजुअल मजदूर और दैनिक मजदूरों को भी शामिल कर प्रतिष्ठान में कुल मजदूरों के 30 प्रतिशत के अनुपात से इस तरह के मजदूरों को रखने की इजाजत दे दी गयी है। साथ ही कानून के उल्लघंन पर जेल भेजने के प्रावधान को समाप्त कर अब सजा के तौर पर आर्थिक दण्ड 500 रू0 तक सीमित कर दिया है।

श्रम कानून (कुछ संस्थानों को विवरणी जमा करने तथा रजिस्टर तैयार करने में छूट) संशोधन अधिनियम 2011 में किसी भी संस्थान को लघु औद्योगिक संस्थान घोषित होने के लिए मजदूरों की संख्या 19 से बढ़ाकर 40 कर दी गयी है। इन प्रतिष्ठानों को विवरणी जमा करने और रजिस्टर रखने से मुक्त करके ठेका मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम, न्यूनतम वेतन कानून, समान वेतन कानून, वेतन भुगतान अधिनियम, कारखाना कानून, बोनस भुगतान अधिनियम आदि 16 श्रम कानूनों के दायित्वों से मुक्त किया गया है।

सरकार ने कारखाना अधिनियम के अनुच्छेद 56 में संशोधन कर भोजनावकाश के साथ 8 घण्टे काम की अवधि को बढ़ाकर 10.5 से 12 घण्टे तक करने का प्रावधान कर दिया है। इस अतिरिक्त काम को ओवरटाइम नहीं माना जायेगा और इसके लिए सामान्य वेतन ही देय होगा। इसी प्रकार अनुच्छेद 64-65 में संशोधन करके वर्तमान ओवरटाइम को 50 घण्टे प्रति तिमाही से बढ़ाकर सीधे 100 घण्टे करने और जनहित के नाम पर राज्य सरकार द्वारा छूट देने पर 125 घण्टे तक किया जा सकता है।

अनुच्छेद 66 में संशोधन कर महिलाओं को रात्रि पाली में काम करने पर लगी रोक समाप्त कर दी गयी है। सबसे महत्वपूर्ण बात इस संशोधन में यह है कि इसमें राज्य सरकारों को कारखाना कानून का दायरा तय करने के लिए नियोजित मजदूरों की संख्या तय करने का अधिकार दे दिया गया है जो अधिकतम 40 मजदूरों की सीमा के अंदर कोई भी सीमा तय कर सकती है।

सरकार ने कई श्रम कानूनों को मिलाकर पांच संहिताएं बनाने का प्रस्ताव रखा है। जिसमें से वेतन विधेयक श्रम संहिता और औद्योगिक सम्बंधों पर श्रम संहिता विधेयक का प्रारूप सरकार ने पेश किया है। वेतन विधेयक श्रम संहिता में न्यूनतम वेतन अधिनियम, बोनस भुगतान अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, समान वेतन अधिनियम आदि चार अधिनियमों को मिलाकर यह संहिता बनायी गयी है। इस संहिता में श्रम कानूनों को लागू कराने के लिए निरीक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर निरीक्षकों की भूमिका मददकर्ता की बना दी गयी है।

समान वेतन अधिनियम को मात्र लिंगभेद तक सीमित कर दिया गया है। जबकि ठेका मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम की धारा 25 (5)(अ) के अनुसार यदि कोई मजदूर ठेकेदार द्वारा नियोजित है, पर वह प्रधान नियोजक द्वारा नियोजित श्रमिक के समान ही काम करता है तो उसे वेतन, छुट्टी, कार्यावधि वहीं प्राप्त होगी जो प्रधान नियोजक के द्वारा नियोजित श्रमिक को मिलती है। प्रस्तावित संहिता इस मामले में पूरे तौर पर चुप्पी साध लेती है।

प्रस्तावित संहिता में उद्योगों/प्रतिष्ठानों की वर्गीकृत सूची के प्रावधान को ही समाप्त कर दिया गया है। न्यूनतम वेतन निर्धारण का अधिकार पूरे तौर पर राज्य सरकार को दे दिया गया है। इसके निर्धारण की शर्तों का भी खुलासा यह संहिता नहीं करती है। यदि मजदूर गैर कानूनी हड़ताल में भाग लेता है तो उसका 8 दिन का वेतन काट लिया जायेगा। इस संहिता में बोनस कानून के तहत यूनियनों द्वारा कम्पनी की बैलेंस शीट चेक करने के अधिकार को समाप्त कर प्रबंधन से सौदेबाजी करके न्यूनतम से अधिक बोनस प्राप्त करने की संभावना को भी छीन लिया गया है।

ट्रेड यूनियन एक्ट 1926, स्थायी आदेश कानून 1946, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को मिलाकर औद्योगिक सम्बंधों पर श्रम संहिता बनायी गयी है। इस संहिता के अनुसार ट्रेड यूनियन पंजीकरण के लिए अब कुल मजदूरों का 10 प्रतिशत या 100 मजदूर जो भी कम हों के बराबर सदस्य होने चाहिए। रजिस्ट्रार को यह विवेकाधीन अधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो यूनियन को रजिस्टर करे या निरस्त कर दे, साथ ही यह भी अधिकार दिया गया है कि वह चाहे जिस टेªड यूनियन को रद्द कर दे। संगठित क्षेत्र की यूनियन में कोई भी बाहरी व्यक्ति न तो पदाधिकारी होगा और न ही कार्यकारणी सदस्य। असंगठित क्षेत्र की यूनियन में मात्र दो व्यक्ति ही पदाधिकारी हो सकते है। यह संहिता ‘रखो और निकालो‘ का अधिकार 300 मजदूरों तक की संख्या में रोजगार देने वाले सभी प्रतिष्ठानों को देती है।

इसका सीधा असर होगा कि उद्योगों में कार्यरत ठेका मजदूर इसके दायरे में आ जायेंगे। स्थायी आदेश कानून में संशोधन करके सेवा शर्तें बदलने की छूट दी जा रही है। प्रस्तावित संहिता में हड़ताल का नोटिस 6 सप्ताह पहले देना होगा और नोटिस देने की तिथि से ही समझौता कार्यवाही प्रारम्भ मान ली जायेगी चाहे समझौता कार्यवाही प्रारम्भ हुई हो या नहीं। समझौता वार्ता जारी रहने और इसके समाप्ति के सात दिन बाद तक हड़ताल नहीं की जा सकती।

इस संहिता के अनुसार गो स्लो/प्रदर्शन तक प्रतिबंधित रहंेगे। यहां तक कि यदि आधे से ज्यादा श्रमिक आकस्मिक अवकाश लेते हैं तो भी हड़ताल मान लिया जायेगा। गैर कानूनी हड़ताल में शामिल होने पर मजदूरों पर 20,000 रू0 से लेकर 50,000 रुपये तक अर्थदण्ड या एक माह की जेल का प्रावधान है और हड़ताल के लिए उकसाने पर 25,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक अर्थदण्ड और जेल का प्रावधान किया गया है। यही नहीं अब मजदूर अपने मुकदमे में वकील की सहायता नहीं ले सकता है। मजदूर की बर्खास्तगी के मामले में जो कुछ भी सबूत रिकार्ड में हैं उन्हीं को आधार बनाया जायेगा, नए गवाह/सबूत प्रतिबंधित रहेंगे।

ठेका मजदूरों की जीवन सुरक्षा के लिए बने ईपीएफ (भविष्य निधि) और ईएसआई (कर्मचारी राज्य बीमा) दोनों में परिवर्तन करने में मोदी सरकार लगी हुई है। ऐसे ही देश में ठेका मजदूरों का करोड़ों रूपया भविष्य निधि का ठेकेदारों और प्रबंधन के द्वारा लूट लिया गया है। ठेका मजदूरों से पैसा काटकर उनके भविष्य निधि खाते में जमा नहीं किया गया और जो जमा है उसे सरकार लूटने में लगी है। बिना कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के साथ बातचीत किए सरकार ने ईपीएफ के 6000 करोड़ रूपए आम वृद्धावस्था पंेशन में इस्तेमाल करने की धोषणा कर डाली।

यहीं नहीं ईपीएफ की जमा राशि का 5 प्रतिशत से लेकर 15 प्रतिशत तक को शेयर बाजार में लगाने की अधिसूचना जारी कर दी है। इसी प्रकार ईएसआई, जो बीमार मजदूर को बीमारी की हालत में नगद लाभ, बीमा और आश्रितों को पेंशन, बीमित महिता को प्रसूति हितलाभ मुहैया कराता है, को चिकित्सा बीमा के पक्ष में वैकल्पिक बनाने की मंशा के साथ ईएसआई अधिनियम में संशोधन करने की दिशा में सरकार प्रयासरत है।

पिछले दिनों जब संसद नहीं चल पा रही थी तो मोदी जी ने कहा कि हम मजदूरों के हितों के लिए बोनस कानून बना रहे थे, श्रम संहिताएं ला रहे थे जिसे विपक्ष लाने नहीं दे रहा है। जबकि सच साफ दिखाई दे रहा है कि कारपोरेट के बूते बनी यह सरकार कारपोरेट हितों के लिए श्रमिकों की जीवन सुरक्षा और प्रदत्त कानूनी अधिकारों को छीनने में लगी हुई है। समाज में यह तर्क प्रणाली चलायी जाती है कि श्रम कानूनों को लचीला करके ही पूंजी निवेश बढ़ाया जा सकता है और रोजगार सृजन किया जा सकता है। तीन दशकों के दौरान बनी सभी सरकारों ने इसी दिशा में कदम भी बढ़ाए। पर वास्तविकता इसके उलटी ही दास्तान पेश करती है। पिछले तीन दशकों के दौरान रोजगार सृजन की वृद्धि दर न के ही बराबर रही है। 2000-05 के दौरान 2.7 प्रतिशत से घटकर रोजगार वृद्धि दर 2005-10 के दौरान मात्र 0.7 प्रतिशत ही रह गयी है। जिस निर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन की बड़ी बातें की जा रही थीं, वहां भी यह नकारात्मक स्तर पर पहुंच गयी है।

दरअसल मोदी सरकार कारपोरेट मुनाफे के लिए जिस रास्ते पर आगे बढ़ रही है वह ठेका मजदूरों की तबाही को और भी बढायेगा। इसलिए आज जरूरत है ठेका मजदूरों के एक बड़े संगठित राजनीतिक आंदोलन की जो इन श्रमिकों के नियमितीकरण करने पर केन्द्रित हो और श्रम कानूनों पर किए जा रहे इन हमलों का मुकाबला करे।

लेखक दिनकर कपूर सोशल-पोलिटिकल एक्टिविस्ट और युवा वकील हैं. उनसे संपर्क dinkarjsm786@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है

रोजगार गारण्टी कानून में मजदूर संगठन की संभावनायें

Submitted by Hindi on Thu, 08/11/2011 – 08:50 Source मीडिया फॉर राईट्स

42 आय बढ़ने के कारण स्वयं सहायता समूहों को अब ज्यादा सक्रिय करने की कोशिशें की जायेगी और उन्हें ही मजदूरों के संगठन के रूप में परिभाषित किया जायेगा। हमें स्पष्ट रहना होगा कि मजदूरों का अपने हकों के संघर्ष के लिये संगठित होने की जरूरत है; जबकि बाजार अब तीस करोड़ नये उपभोक्ताओं का इंतजार कर रहा है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को आजीविका के हर तरह के अवसरों में शोषण का सामना करना पड़ा है। अगस्त 2005 में भारत सरकार ने देश के 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्र के, मजदूरों को रोजगार के शोषण मुक्त अवसर उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून बनाया और 2 फरवरी 2006 से देश के सबसे जरूरतमंद और मानव विकास के नजरिये से पिछड़े हुए 200 जिलों में लागू किया। इस कानून के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले हर परिवार को वर्ष में एक सौ दिन शारीरिक श्रम आधारित रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। यह एक मांग आधारित योजना है जिसमें न्यूनतम मजदूरी पर श्रम करने वाले हर व्यक्ति को उसके द्वारा मांग किये जाने पर रोजगार उपलब्ध कराया जायेगा। यदि रोजगार मांगने के 15 दिन के भीतर रोजगार नहीं दिया जाता है तो बेरोजगारी भत्ता दिया जायेगा। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में पंचायत और प्रशासन के स्तर पर दायित्व और कर्तव्यों का स्पष्ट चित्रण किया गया है। इस योजना का मकसद केवल मजदूरी के अवसर उपलब्ध करवाना नहीं है बल्कि स्थाई विकास की संभावनाओं का उपयोग करते हुए जल-जंगल-जमीन की उन्नति के लिए योजनाएं बनाकर क्रियान्वित करना भी है। अब तक असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए संघर्ष का कोई कानूनी मंच उपलब्ध नहीं था पर यह कानून अब इस तरह के कानूनी मंच की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।

मध्यप्रदेश में शुरूआती दौर में 18 जिलों में यह योजना लागू की गई है। उन जिलों में कुल 43.5 लाख ग्रामीण परिवार निवास करते हैं। इन सभी परिवारों का रोजगार गारंटी योजना के अन्तर्गत पंजीयन किया जा चुका है और रोजगार गारंटी कार्ड भी वितरित किए जा चुके हैं। दूसरे शब्दों में पंजीयन और रोजगार गारंटी कार्ड की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद अब मजदूरों के बीच संगठन निर्माण की संभावनायें भी बढ़ जाती हैं। हम सभी यह जानते हैं कि आदर्श कानून बन जाने के बाद भी व्यवस्थाओं में सुधार नहीं होता है क्योंकि उन कानूनी अधिकारों का राजनैतिक नजरिए से उपयोग ही नहीं किया जाता है। अब गुजरात के गोधरा जिले में मानो रोजगार गारण्टी कानून की आत्मा भी जन्म ले रही है। रोजगार को एक संवैधानिक हक के रूप में स्वीकार करने की वकालत करने वाले हमेशा से यह मानते रहे हैं कि इस कानून से न केवल रोजगार और मजदूरी का अधिकार मिलेगा वरन असंगठित क्षेत्र को संगठित करने के लिये भी यही कानून सबसे अहम भूमिका भी निभायेगा। गुजरात राज्य के छह जिले रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत चुने गये हैं। इस राज्य को हमेशा चमकते भारत का प्रतिनिधित्व करते देखा गया है। उदारवाद के समर्थक विशेषज्ञ इसे आधुनिक विकास के तीर्थक्षेत्र के रूप में पेश करते रहे हैं। गुजरात को ही सामने रखकर यह बताया जाता रहा है कि आलीशान इमारतें, सपाट सड़कें, भारी उद्योगों की स्थापना से गरीबी को मिटाया जा सकता है परन्तु वास्तव में इस विश्लेषण के इस यथार्थ को छिपाया गया कि पर्यावरण के विनाश और सामाजिक द्वेश भाव की जिस नई परम्परा को वहां जन्म मिला है उससे लोकतांत्रिक समाज के लिये नये संकट भी पैदा हुए हैं। दुखद तथ्य यह है कि यह संकट ज्यादा खतरनाक है।

भारत के अन्य राज्यों की ही तरह गुजरात में भी 2 फरवरी 2006 से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून लागू हुआ और पांच माह की अवधि में ही वहां विकास के रंगीन पर्दे के पीछे छिपी गरीब मजदूरों के शोषण की कहानी सामने आने लगी। यहां व्यापक रूप से मजदूरों को रोजगार गारण्टी कानून और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के उल्लंघन के कारण शोषण का सामना करना पड़ा। साबरकांठा जिले के बलिसाना गांव में 700 मजदूरों ने 14 फरवरी से 18 दिन तक हाड़तोड़ मजदूरी की। राज्य में रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत काम करने वाले मजदूरों को यह आश्वासन दिया गया था कि उन्हें 35 रुपए रोज मजदूरी मिलेगी किन्तु जब मई के अंतिम सप्ताह में अलग-अलग कार्य स्थलों पर भुगतान किये गये तब मजदूर अचंभित रह गये क्योंकि उन्हें केवल चार से सात रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी दी जा रही थी। इतना ही नहीं व्यापक स्तर पर रोजगार कानून के सबसे अहम् प्रावधानों (जैसे सात से पन्द्रह दिन के भीतर अनिवार्य रूप से मजदूरी का भुगतान, महिलाओं को समान मजदूरी, बच्चों के लिये झूलाघर और मजदूरों के काम की सही माप करना) का हर कदम पर उल्लंघन किया गया। केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये कानून का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि मजदूरों को दी जाने वाली न्यूनतम मजदूरी 60 रुपए प्रतिदिन से कम नहीं होगी परन्तु राज्य सरकार ने यहां भी तुगलकी रवैया अख्तियार किया और मजदूरों के कानूनी हक छीने। ऐसे में पहले मजदूरों ने कानून और राज्य की योजना के प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत स्तर अपने हकों की मांग की परन्तु जल्दी ही वे समझ गये कि संगठित हुये बिना उन्हें अधिकार नहीं मिल पायेंगे। तब इन जिलों में मजदूरों ने आपस में चर्चा करना शुरू की। अंतत: गोधरा में लगभग साढ़े पांच हजार मजदूर इकट्ठा हुये और यहां राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना मजदूर यूनियन का निर्माण हुआ।

मूलत: रोजगार गारण्टी कानून के सार्थक क्रियान्वयन के लिये ईमानदार राजनैतिक प्रतिबद्धता होना एक जरूरी शर्त है। यह शर्त समाज में बेरोजगारी की परिस्थितियों में बदलाव लाने में क्या भूमिका निभा सकती है इसे मध्यप्रदेश और गुजरात का तुलनात्मक विश्लेषण करके महसूस किया जा सकता है। मध्यप्रदेश की ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में 18 जिलों के 43 लाख परिवार शामिल हैं और इन सभी परिवारों का पंजीयन भी हो चुका है और रोजगार कार्ड भी जारी किये जा चुके हैं। यहां प्रयास कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं प्रदेश में 18 लाख से ज्यादा मजदूरों को 61.37 रुपए की दर पर मजदूरी तो मिल ही रही है साथ ही 20 हजार से ज्यादा सड़कों, तालाबों और अन्य सामुदायिक संरचनाओं का काम पूरा हो चुका है। राज्य में पलायन में 40 प्रतिशत की कमी आई है और खुले बाजार में होने वाला शोषण भी कम हुआ है। परन्तु वहीं दूसरी ओर गुजरात में रोजगार योजना के छह जिलों में बसे लगभग 70 लाख परिवारों में से केवल सवा सात लाख परिवारों का ही पंजीयन हो पाया है और इनमें से भी कुछ को ही रोजगार कार्ड जारी किये गये हैं। राज्य में अब तक योजना के सम्बन्ध में पुख्ता दिशा-निर्देश जारी नहीं हुये हैं न ही सम्बन्धित अधिकारियों- जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम हुये हैं।

ऐसी परिस्थितियों में विश्लेषण के बहुत सारे पक्ष हो सकते हैं परन्तु सबसे अहम पक्ष यह है कि क्या वास्तव में देश के असंगठित क्षेत्र में काम करके हर रोज शोषण का शिकार होने वाले मजदूर संगठित होकर अपने हकों को हासिल और इस्तेमाल कर पायेंगे। इतिहास इस बात का गवाह है कि कभी भी कोई भी अधिकार तब तक बेमानी है जब तक कि उसे उसकी मूल भावना के साथ उपयोग न लाया जाये। जब रोजगार गारण्टी कानून के लिये जनसंघर्ष चल रहा था तब उसके संघर्ष का सबसे अहम् आधार वक्तव्य यही था कि देश की कुल कार्यशील जनसंख्या का 93 फीसदी हिस्सा असंगठित मजदूर वर्ग के लिये न तो सरकारी संरक्षण है न ही किसी कानून का सहारा और चूंकि ये असंगठित हैं इसलिये राजनैतिक संघर्ष के अवसर भी शून्य ही हो जाते हैं। अपेक्षा यही थी कि रोजगार गारण्टी कानून से लोक आधारित विकास सही दिशा मिलेगा और यदि इस कानून के क्रियान्वयन की दिशा भटकेगी तो मजदूरों को संगठित होकर कानूनी रूप से इसे सही दिशा देने का अधिकार भी मिलेगा। गुजरात में यही हुआ भी है। यह सही है कि कानून स्पष्ट रूप से न्यूनतम मजदूरी की परिभाषा, कम से कम सौ दिन के रोजगार की गारण्टी, बेरोजगारी भत्ते, कार्यस्थल पर पीने के पानी, बच्चों के लिये झूलाघर, प्राथमिक चिकित्सा के अधिकार की बात करता है परन्तु हमारी सामाजिक व्यवस्था में वंचितों का शोषण बिना फायदे के भी किया जाता है ताकि ताकतवर का भय बना रहे और इसी भय के वातावरण को बनाये रखने के लिये सरकारी तंत्र, राजनीति के नेता और समाज के दबंग इन प्रावधानों को नहीं लागू होने देना चाहते हैं। वे स्पष्ट हैं कि मजदूर को सशक्तिकरण का अहसास नहीं होना चाहिए।

इतना ही नहीं पहली मर्तबा कोई कानून जनसंघर्ष की महत्ता को न केवल स्वीकार कर रहा है बल्कि सामाजिक अंकेक्षण और पारदर्शिता के प्रवधानों के रूप में उसे वैधानिक रूप भी प्रदान करता है। बहरहाल कानून तो बन गया किन्तु कानून बन जाना इस बात की गारण्टी नहीं है कि मजदूरों को उनका हर हक थाली में सजाकर परोस दिया जायेगा। सामाजिक अंकेक्षण केवल भ्रष्टाचार को नियंत्रित नहीं करेगा बल्कि गांव में सामाजिक सत्ता के समीकरण को भी पलट कर रख देगा। जब कानून यह कर सकता है तो इसका साफ मतलब यह है कि बिना संगठित हुये कानून को मूल भावना के साथ लागू कर पाना संभव नहीं है। हम बेरोजगारी भत्ते का साधारण सा उदाहरण ले सकते हैं। कानून कहता है कि व्यक्ति के रोजगार मांगने की तारीख से 15 दिन की अवधि में यदि सरकार ने रोजगार नहीं दिया तो अगले दिन से उसे बेरोजगारी भत्ता देना होगा। यह बहुत स्पष्ट रूप से लिखा गया है परन्तु जब नियम बने तो 11 ऐसी बाधायें खड़ी कर दी गई जिनके कारण बेरोजगारी भत्ता पाना लगभग असंभव हो गया है। सरकार भी कहती है कि यदि पूरे गांव को काम नहीं मिला और वे बेरोजगारी भत्ता चाहते हैं तो सरकार स्वप्रेरणा से बेरोजगारी भत्ता नहीं देगी बल्कि उन्हें इसके लिये भी आवेदन देना होगा और भत्ते की पात्रता सिद्ध करना होगा। इतना ही नहीं पूरा गांव इसके लिये एक साथ संगठित होकर आवेदन नहीं करेगा बल्कि हर व्यक्ति को अपना अलग आवेदन देना होगा। एक-एक व्यक्ति यदि एक-एक स्वार्थ को पूरा करने की प्रक्रिया में जायेगा तो इस कानून के कोई मायने नहीं होंगे। निजी हकों को संगठित हकों में और निजी प्रयासों को संगठित रूप देने का सिद्धांत ही समाज में बदलाव ला पायेगा।

रोजगार गारंटी योजना में मजदूरी के सवाल पर शोषणकारी व्यवस्था बनने की व्यापक संभावनायें हैं। अनुभव यह सिद्ध कर रहे है कि लक्ष्य आधारित (टास्क आधारित) मजदूरी निर्धारण होने के कारण मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पा रही है। अभी एक-एक मजदूर अपनी मजदूरी का सवाल बहुत ही निजी स्तर पर उठाकर शांत हो जाता है। भ्रष्टाचार और शोषण करने वाले जानते हैं कि मजदूरों की आवाज संगठित नहीं है। इसलिये वे थोड़ा जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटते हैं, किन्तु ऐसी स्थिति में जब मजदूरी का सवाल हर मजदूर का सवाल बनेगा तो यह तय है कि उस आवाज को दबाया नहीं जा सकेगा। सामाजिक अंकेक्षण न केवल सवाल-जवाब करके जांच-पड़ताल करने की एक प्रक्रिया है बल्कि एक तरह की न्यायिक प्रक्रिया है जिसमें भ्रष्टाचार और विकास की परिभाषा को विकृत करने वालों की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ उन्हें दण्डित किये जाने की भी व्यवस्था है। सीधी सी बात है कि भ्रष्टाचार वह करता है जिसका प्रक्रिया पर नियंत्रण होता है और प्रक्रिया पर नियंत्रण ताकतवर का होता है। यह ताकत राजनीति की हो सकती है, जाति की हो सकती है या धन-बल की। जब हम यह अपेक्षा करते हैं कि ग्रामसभा और मजदूरों की निगरानी समिति सामाजिक अंकेक्षण को भ्रष्टाचार को रोकें; तब सवाल यह उठता है कि क्या बिना संगठन के सामाजिक अंकेक्षण के कानूनी प्रावधान को भी लागू किया जा सकता है। निश्चित रूप से संगठनों के निर्माण से सामाजिक संघर्ष के प्रयासों को एक ठोस आधार मिलेगा। लोक निर्माण विभाग से एक मजदूर मस्टररोल की कॉपी चाहकर भी हासिल नहीं कर सकता है परन्तु मजदूरों की यूनियन संगठित रूप से तमाम दस्तावेज हासिल कर सकती है। एक तरह से संगठन सत्ता के समीकरण बदल देता है।

मजदूर यूनियनों का दायरा केवल मजदूरी या बेरोजगारी भत्ते तक ही सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। मसला रोजगार गारंटी योजना के अन्तर्गत निर्मित होने वाली स्थाई सम्पत्तियों पर समुदाय के अधिकार का भी नहीं है। संभवत: ग्रामसभा और पंचायतें वहां बनने वाली सम्पत्तियों की मालिक होंगी और संगठन इस मालिकाना हक को हासिल करने के लिये ग्रामसभा की मदद कर पायेंगे। भविष्य में संगठन निर्माण की संभावनाओं को ट्रेड यूनियन के रूप में चरितार्थ किया जा सकता है। हमें यह भी देखना होगा कि कहीं स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा के जाल में मजदूरों के समूह न जा फंसे। आय बढ़ने के कारण स्वयं सहायता समूहों को अब ज्यादा सक्रिय करने की कोशिशें की जायेगी और उन्हें ही मजदूरों के संगठन के रूप में परिभाषित किया जायेगा। हमें स्पष्ट रहना होगा कि मजदूरों का अपने हकों के संघर्ष के लिये संगठित होने की जरूरत है; जबकि बाजार अब तीस करोड़ नये उपभोक्ताओं का इंतजार कर रहा है।

मजदूर, न्यूनतम मजदूरी और सामजिक न्याय

ऐसा लगता है कि मानों हम 1792 के पहले फ्रांस में शोषण के जाल में फंसे मजदूरों को एक बार फिर देखने की स्थिति में पहुंच रहे हैं। मजदूरों का यह नीति आधारित शोषण भारत में अलग-अलग स्तरों पर हो रहा है, ठेकेदार और निजी क्षेत्र को तो एक बार अलग रखकर देखते हैं तो यह भी पता चलता है कि भारत सरकार की नीतियाँ और व्यवस्था भी उन्हें समानता और शोषण से मुक्ति का अधिकार प्रदान नहीं कर रही है। भारत के अलग-अलग राज्यों में एक जैसे काम के लिए तय की गई मजदूरी में भारी अंतर दिखाई पड़ता है और तो और अफसोसजनक सच्चाई यह है कि इसी न्यूनतम मजदूरी को हासिल करने के लिये सरकार मजदूरों के लिये इतने कड़े लक्ष्य तय करती रही है कि उन्हें औसत से ज्यादा शारीरिक श्रम करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। आज तक मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों में समय और गति के वह अध्ययन नही कराये गये हैं जिनसे तय होता है कि एक व्यक्ति निर्धारित समय में श्रम करके कितना काम पूर्ण कर सकता है। उतना ही काम एक श्रमिक के लिये अधिकतम लक्ष्य के रूप में निर्धारित किया जाना चाहिये। वास्तविकता में जो काम मजदूरो से करवाये जा रहे हैं वे उनकी क्षमताओं से कहीं ज्यादा नजर आते हैं।

18 वीं शताब्दी में फ्रांसीसी क्रांति ने कृषि दासों को मुक्त किया। यह वही दौर था जब मजदूरों के लिये न तो श्रम करने के समय की न तो कोई सीमा तय थी, न ही यह तय था कि उन्हे कम से कम कितनी मजदूरी (कहें कि न्यूनतम मजदूरी) मिलेगी। हर तरह से मजदूर सामंतो, जमींदारों और व्यापारियों के शोषण के षिकार होते रहे। इस शोषण ने असंख्य मजदूरों की जानें तक ले लीं। फिर जब श्रमिक वर्ग (या कहें कि मेहनतकशों की दुनिया) में असंतोष फैला तब ब्रिटेन में पहली बार 1896 में फैक्टरी कानून बनाया गया जिसमें यह खाका खींचा गया कि एक मजदूर को एक सप्ताह या एक दिन में कितने घंटे श्रम करना होगा। इसी के साथ काम के एवज में न्यूनतम मजदूरी का विचार भी अस्तित्व में आया। भारत तक न्यूनतम मजदूरी की बात आने में आधी शताब्दी से ज्यादा समय लगा और 1948 में न्यूनतम मजदूरी का कानून बना।

उल्लेखनीय है कि स्तंत्रता के बाद भारत में लगभग चार दशकों तक न्यायपालिका ने समय-समय पर न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को संरक्षित करने की पहल की। 1957 में भारतीय श्रम सम्मेलन की त्रिपक्षीय समिति की रिपोर्ट को तवज्जो देते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त की और कहा कि नयूनतम मजदूरी तय करते समय कुछ बिन्दुओं पर संवेदनषीलता के साथ विचार किया जाना चाहिये –

1)   एक मानक परिवार में सदस्यों के रूप में महिलाओं, बच्चों और किशोर वर्ग को शामिल माना जाना चाहिए। 
2)   न्यूनतम भोजन की आवश्यकता को तय करते समय कैलोरी ऊर्जा को आधार माना जाना चाहिये। 
3)   कपड़े की आवश्यकता को भी इसमें शामिल करें और परिवार की जरूरत के तहत 72 गज कपड़ा प्रति परिवार का मानक माना जाये। 
4)   आवास के लिये औद्योगिक आवास योजना के तहत न्यूनतम क्षेत्र के किराये की राशि को भी न्यूनतम मजदूरी में शामिल किया जाये और 
5)   ईंधन, रोशनी और अन्य खर्चो के लिये न्यूनतम मजदूरी का 20 प्रतिशत हिस्सा रखा जाये।

अपने इसी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि नियोजकों को हर परिस्थिति में मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करना चाहिये, यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें अपना व्यवसाय बंद कर देना चाहिये। भारत में न्यूनतम मजदूरी कानून को एक संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित करने का जरिया माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने पीयूसीआर बनाम भारतीय संघ के एक मामले में न्यूनतम मजदूरी के भुगतान न किये जाने को बेगार के बराबर माना है और उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-23 के तहत इस पर रोक है। यह कानून व्यावहारिक प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद-32 एवं अनुच्छेद-226 की परिधि में आ जाता है, जिनमें व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा के बारे में प्रावधान किये गये हैं। पहले न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिये तय करने के लिए किये गये चार आधारों में सर्वोच्च न्यायालय ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम् भारतीय संघ (1984) के मामले में पाँचवा पक्ष जोड़ा। जिसमें यह तय किया गया कि षिक्षा-स्वास्थ्य की आवष्यकताओं, मनोरंजन, सामाकि रीति-रिवाजों एवं त्यौहारों में शामिल होने के लिये होने वाले खर्च को भी इसमें शामिल किया जाये जो न्यूनतम मजदूरी का 25 प्रतिषत है।

भारतीय न्यायिक व्यवस्था ने संविधान की जन कल्याणकारी राज्य की भावना को मूर्त रूप देने के लिये कई महत्वपूर्ण कदम उठाये, परन्तु आज यह माना जाता है कि न्यूनतम मजदूरी कानून का पालन नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि इसमें लागत बढ़ती है और लाभ-उत्पादन कम होता है। अब मजदूरों को दिन भर के श्रम के बदले न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती है, बल्कि न्यूनतम मजदूरी उन्हें तभी मिलती है जब वे सरकार के विचारक तकनीकी विषेषकों द्वारा तय किये गये काम के लक्ष्य को पूर्ण करें। जैसे उन्हें दिनभर में 100 घनफीट की खुदाई कर मिट्टी को एक निश्चित दूरी तक फेंकने पर ही न्यूनतम मजदूरी मिलती है।

इसी तरह एक ओर तो संविधान में दर्ज मूलभूत अधिकार यह कहते हैं कि देश में सबको समानता का अधिकार है और समाज मजदूरी पाने के अधिकार हैं परन्तु 1 जनवरी 2009 को भारत सरकार द्वारा जारी नोटीफिकेशन  में हर राज्य के लिये अलग-अलग मजदूरी के सिद्धांत को मान्यता दे दी गई। एक राज्य में न्यूनतम मजदूरी 70 रूपये है तो दूसरे राज्य में 91 रूपये और किसी अन्य राज्य में 141 रूपये। एक मायने में भांति-भांति के तरीकों से भारत में मजदूरों के न्यूनतम मजदूरी और समानता के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। व्यवस्था अब केवल मौन नहीं है बल्कि व्यवस्था इस शोषण में शामिल है और बाजार के लिये अग्रज की भूमिका निभा रही है।

मजदूरी संबंधी कानून
मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936
पारिश्रमिक भुगतान अधिनियम, 1936 एक मुख्‍य विधान है जिसका अधिनियमन कुछ विशिष्‍ट उद्योगों में नियुक्‍त कामगारों की पारिश्रमिक के भुगतान को विनियमित करने और गैर कानूनी कटौती और/या अनुचित विलंब उनके विरुद्ध पारिश्रमिक के भुगतान में किया जाता है, के लिए त्‍वरित एवं प्रभावी सुधार सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। यह उन व्‍यक्तियों के लिए प्रयोज्‍य होता है जो फैक्‍टरी, औद्योगिक या अन्‍य प्रतिष्‍ठापन या रेलवे में प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप में, उप संविदाकार के माध्‍यम से नियुक्‍त हैं। इसके अतिरिक्‍त, अधिनियम 1600 रुपए प्रति माह वेतन का आहरण करने वाले कर्मचारियों पर प्रयोज्‍य होता है।

केन्‍द्रीय सरकार इस अधिनियम को रेलवे, खानों, तेल क्षेत्रों और हवाई परिवहन सेवाओं में प्रवर्तित करने के लिए जिम्‍मेदार है, जबकि राज्‍य सरकारें इसके लिए फैक्‍टरियों और अन्‍य औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों में प्रवर्तित करने के लिए जिम्‍मेदार हैं।

अधिनियम के मूल प्रावधान निम्‍नानुसार है:-

    • पारिश्रमिक भुगतान करने के लिए जिम्‍मेदार व्‍यक्ति पारिश्रमिक अवधि का निर्धारण करेगा जिस समय तक पारिश्रमिक का भुगतान किया जाना है। कोई पारिश्रमिक अवधि एक माह से अधिक नहीं होगी।
    • सभी पारिश्रमिक का भुगतान वर्तमान कानूनी निविदा में किया जाएगा अर्थात वर्तमान सिक्‍का और मुद्रा नोट या दोनों में तथापि, नियोक्‍ता कामगारों का लिखित प्राधिकार प्राप्‍त करने के बाद पारिश्रमिक का भुगतान या तो चैक द्वारा या उनकी पारिश्रमिक को उनके बैंक खाते में जमा करने के माध्‍यम से करता है।
    • पारिश्रमिक के सभी भुगतान कार्य दिवसों में किया जाएगा। रेलवे, फैक्‍टरी या औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों में जहां 1000 से कम व्‍यक्ति नियुक्‍त होते हैं वहां अतिम भुगतान की तारीख समाप्‍त होने के बाद सातवां दिन समाप्‍त होने के पहले किया जाना है। अन्‍य सभी मामलों में पारिश्रमिक अवधि के अंतिम दिन का 10वां दिन समाप्‍त होने के पहले किया जाएगा। तथापि, कामगार की पारिश्रमिक, जिसकी सेवा समाप्‍त कर दी गई है उसे उसकी सेवा समाप्ति के अगले ही दिन भुगतान किया जाएगा।
  • यद्यपि, नियुक्‍त व्‍यक्ति का भुगतान उसको किसी प्रकार की कटौती के बगैर किया जाएगा, अधिनियम के तहत कर्मचारी की पारिश्रमिक में कटौती निम्‍नलिखित के कारण अनुमत है:- (i) जुर्माना; (ii) कर्तव्‍य से अनुपस्थिति; (iii) स्‍पष्‍ट रूप से कर्मचारी के सौंपे गए माल की क्षति या नुकसान; (iv) नियोक्‍ता द्वारा प्रदान किया जाने वाला आवास और अन्‍य सुख सुविधाओं; (v) अग्रिम की वसूली या पारिश्रमिक की अति अदायगी का समायोजन; (vi) राज्‍य सरकार द्वारा अनुमोदित नियमों के अनुसार श्रम कल्‍याण के लिए गठित किसी निधि से दिए गए ऋण की वसूली और उसके संबंध में देय ब्‍याज; (vii) किसी भविष्‍य निधि के लिए अंशदान और अग्रिम का भुगतान; (viii) आयकर; (ix) राज्‍य सरकार द्वारा अनुमोदित सहकारी समितियों के भुगतान या भारतीय डाक कार्यालय द्वारा अनुरक्षित बीमा योजना के लिए भुगतान; (x) अपनी बीमा पॉलिसी में या प्रतिभूतियों की खरीद के लिए किसी प्रीमियम के भुगतान के लिए कर्मचारी के लिखित प्राधिकार से कटौती की जाती है:-
  • अधिनियम में जुर्माने के लिए निम्‍नलिखित नियम निर्धारित किए गए हैं:-
      • अनुमोदित कार्य एवं चूक के लिए जुर्माना लगाया जाएगा।
      • ऐसी सूची को विनिर्दिष्‍ट करने वाली सूचना, परिसर में निर्धारित तरीके से प्रदर्शित की जाएगी जहां कार्य किया जाता है या ऐसी जगह पर जहां निर्धारित किया जाए, यदि व्‍यक्ति रेलवे में नियुक्‍त हो।
      • किसी नियुक्‍त व्‍यक्ति पर किसी प्रकार का जुर्माना नहीं लगाया जाएगा जब तक कि जुर्माने के लिए कारण बताने हेतु उसे अवसर नहीं दिया जाए या अन्‍यथा ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जुर्माना अधिरोपित करने के लिए निर्धारित किया गया है।
      • जुर्माने की कुल राशि जो किसी एक पारिश्रमिक अवधि में किसी नियुक्‍त व्‍यक्ति पर अधिरोपित किया जाता है, उसकी राशि उस पारिश्रमिक अवधि के संबंध में उसको भुगतान योग्‍य पारिश्रमिक का तीन प्रतिशत से अधिक न हो।
      • पन्‍द्रह वर्ष से कम आयु वाले किसी नियुक्‍त व्‍यक्ति पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।
      • नियुक्‍त व्‍यक्ति पर लगाए गए जुर्माने की वसूली उससे किस्‍त में नहीं वसूली जाएगी या जिस दिन जुर्माना लगाया गया हो उसके बाद साठ दिनों की समाप्ति पर इसे नहीं वसूला जाएगा।
    • सभी जुर्माने और उनकी सभी वसूलियां एक रजिस्‍टर में दर्ज किए जाएंगे उसको पारिश्रमिक के लिए जिम्‍मेदार व्‍यक्ति के पास रखा जाएगा।

इसलिए अधिनियम का मुख्‍य लक्ष्‍य पारिश्रमिक भुगतान के लिए समय और भुगतान तरीका निर्धारित करने द्वारा कुप्रथाओं को समाप्‍त करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि कामगारों को उनके पारिश्रमिक का भुगतान नियत अंतराल में किया जाए, जिसमें किसी प्रकार की प्राधिकृत कटौती न की जाए। अधिनियम में पारिश्रमिक भुगतान (संशोधन) अधिनियम 2005 द्वारा संशोधन किया गया है ताकि इसकी संभावना क्षेत्र का विस्‍तार और अधिक प्रभावी प्रवर्तन की व्‍याख्‍या की जा सके। मुख्‍य संशोधित प्रावधान पारिश्रमिक की सीमा 1600 रुपए प्रति माह से 6500 रुपए प्रति माह बढ़ाना, अधिनियम की प्रयोज्‍यता के लिए और सरकार को अधिसूचना द्वारा अधिकृत करना है।

प्रमुख श्रम अधिनियम

  1. भूमिका
  2. मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936
  3. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948
  4. बोनस संदाय अधिनियम, 1965
  5. समान पारिश्रमिक अधिनियम,1976
  6. ठेका श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम, 1970
  7. बाल श्रम (निरोध एवं विनियमन)अधिनियम,1986
  8. औद्योगिक रोजगार (स्थाई आदेश) अधिनियम, 1946
  9. रेलवे कर्मचारी (कार्य के घंटे और विश्राम की अवधि) नियमावली, 2005
  10. प्रसूति लाभ अधिनियम, 1961
  11. उपदाय संदाय अधिनियम,1972
  12. औद्योगिक विवाद अधिनियम,1947
  13. अन्तर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक(रोज़गार और सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम, 1979
  14. भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक(रोज़गार एवं सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम, 1996
  15. श्रम कानून(कतिपय प्रतिष्ठानों द्वारा रजिस्टरों को रखने और प्रस्तुत करने की छूट) अधिनियम, 1996

भूमिका

श्रम अधिनियम या श्रम कानून किसी राज्य द्वारा निर्मित उन कानूनों को कहते हैं जो श्रमिक (कार्मिकों), रोजगार प्रदाताओं, ट्रेड यूनियनों तथा सरकार के बीच सम्बन्धों को पारिभाषित करतीं हैं।श्रमिक समाज के विशिष्ट समूह होते हैं। इस कारण श्रमिकों के लिये बनाये गये विधान, सामाजिक विधान की एक अलग श्रेणी में आते हैं। औद्योगगीकरण के प्रसार, मजदूरी अर्जकों के स्थायी वर्ग में वृद्धि, विभिन्न देशों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में श्रमिकों के बढ़ते हुये महत्व तथा उनकी प्रस्थिति में सुधार, श्रम संघों के विकास, श्रमिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, संघों श्रमिकों के बीच शिक्षा के प्रसार, प्रबन्धकों और नियोजकों के परमाधिकारों में ह्रास तथा कई अन्य कारणों से श्रम विधान की व्यापकता बढ़ती गई है। श्रम विधानों की व्यापकता और उनके बढ़ते हुये महत्व को ध्यान में रखते हुये उन्हें एक अलग श्रेणी में रखना उपयुक्त समझा जाता है।

सिद्धान्तः श्रम विधान में व्यक्तियों या उनके समूहों को श्रमिक या उनके समूह के रूप में देखा जाता है।आधुनिक श्रम विधान के कुछ महत्वपूर्ण विषय है – मजदूरी की मात्रा, मजदूरी का भुगतान, मजदूरी से कटौतियां, कार्य के घंटे, विश्राम अंतराल, साप्ताहिक अवकाश, सवेतन छुट्टी, कार्य की भौतिक दशायें, श्रम संघ, सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल, स्थायी आदेश, नियोजन की शर्ते, बोनस, कर्मकार क्षतिपूर्ति, प्रसूति हितलाभ एवं कल्याण निधि आदि है।

मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936

केन्द्र सरकार रेलवे, खदान/तेल क्षेत्रों, वायु, परिवहन एवं महत्वपूर्ण बन्दरगाहो के प्रतिष्ठानों के संबंध में अधिनियम के अर्न्तगत उपयुक्त सरकार है। प्रत्येक नियोक्ता रेलवे (कारखानों को छोडकर) को मजदूरी के भुगतान के लिए जिम्मेदार है,यदि नियोक्ता रेलवे प्रशासन है और रेलवे प्रशासन ने संबंधित स्थानीय क्षेत्र के लिए इसके लिए किसी व्यक्ति को नामित किया है। नियोक्ता श्रमिकों द्वारा कमाई मजदूरी को रोक नहीं सकते हैं और न ही वे कोई अनधिकृत कटौती कर सकते हैं। मजदूरी की अवधि के अन्तिम दिन के बाद विनिर्दिष्ट दिन समाप्त होने से पूर्व भुगतान अवश्य किया जाना चाहिए। जुर्माना केवल उन कृत्यों अथवा विलोपों के लिए नहीं लगाया जा सकता है जिन्हें उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है और जुर्माना देय मजदूरी के तीन प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए । यदि मजदूरी के भुगतान में विलम्ब होता है अथवा गलत कटौतियाँ की जाती हैं तो श्रमिक अथवा उनके मजदूर संघों द्वारा पीडब्ल्यू अधिनियम के अन्तर्गत प्राधिकारी के समक्ष दावा दायर कर सकते हैं और प्राधिकारी के आदेश के विरूद्ध अपील दायर की जा सकती है।वर्तमान समय में 18,000 प्रति माह तक वेतन लेने वाले कर्मचारी इस अधिनियम के अर्न्तगत शामिल हैं।

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948

यह अधिनियम सरकार को विनिर्दिष्ट रोजगारों में कार्य कर रहे कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के लिए प्राधिकृत करता है। इसमें उपयुक्त अन्तरालों और अधिकतम पाँच वर्षो के अन्तराल पर पहले से निर्धारित न्यूनतम मजदूरियों की समीक्षा करने तथा उनमें संशोधन करने का प्रावधान है। केन्द्र सरकार अपने प्राधिकरण द्वारा अथवा इसके अर्न्तगत चलाए जा रहे किसी अनुसूचित रोजगार के लिए अथवा रेलवे प्रशासन में अथवा खदानों,तेल क्षेत्रों अथवा बडे बन्दरगाहों अथवा केन्द्रीय अधिनियम के अर्न्तगत स्थापित किसी निगम के संबंध में उपयुक्त एजेन्सी है। अन्य अनुसूचित रोजगार के संबंध में राज्य सरकारें उपयुक्त सरकार हैं। केन्द्र सरकार का भवन एवं निर्माण कार्यकलापों जो अधिकतर केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग, रक्षा मंत्रालय आदि द्वारा संचालित किए जाते हैं, में तथा रक्षा एवं कृषि मंत्रालयों के अर्न्तगत कृषि फार्मो के साथ सीमित संबंध है। अधिकतर ऐसे रोजगार राज्य क्षेत्रों के अर्न्तगत आते हैं और उनके द्वारा ही मजदूरी निर्धारित/संशोधित करना तथा उनके अपने क्षेत्रों के अर्न्तगत आने वाले अनुसूचित रोजगार के संबंध में उनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करना अपेक्षित होता है।

केन्द्रीय क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी का प्रवर्तन केन्द्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र(सी आई आर एम) के जरिए सुनिश्चित किया जाता है। केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय क्षेत्र के अर्न्तगत 40 अनुसूचित रोजगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम,1948 के अर्न्तगत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की है। मुख्य श्रमायुक्त छ महीने के अन्तराल पर अर्थात् 1 अप्रैल और 1 अक्तूबर के प्रभाव से इसकी समीक्षा करने वाला वी डी ए है।

बोनस संदाय अधिनियम, 1965

यह अधिनियम सभी कारखानों और प्रत्येक उस प्रतिष्ठान पर लागू होता है। जो 20 अथवा इससे अधिक श्रमिकों को नियुक्त करता है। बोनस संदाय अधिनियम,1965 में मजदूरी के न्यूनतम 8.33 प्रतिशत बोनस का प्रावधान है। पात्रता उद्देश्यों के लिए निर्धारित वेतन सीमा 3,500 रुपये प्रतिमाह है और भुगतान इस निर्धारण के अन्तर्गत होता है कि 10,000 रु.तक प्रति माह मजदूरी अथवा वेतन लेने वाले कर्मचारियों को देय बोनस का परिकलन इस प्रकार किया जाता है जैसे कि उनका वेतन अथवा उनकी मजदूरी 3,500 रुपये प्रतिमाह हो।

केन्द्र सरकार ऐसे उद्योगों और प्रतिष्ठानों के संबंध में उपयुक्त सरकार है जिनके लिए यह औद्यगिक विवाद अधिनियम,1947 के अर्न्तगत उपयुक्त सरकार है।

समान पारिश्रमिक अधिनियम,1976

अधिनियम में पुरुष तथा महिला श्रमिकों के लिए एक ही और समान प्रकृति के कार्य के लिए समान मजदूरी का तथा स्थानांतरणों, प्रशिक्षण और पदोन्नति आदि के मामलों में महिला कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं करने का प्रावधान है।

केन्द्र सरकार ऐसे उद्योगों और प्रतिष्ठानों के संबंध में उपयुक्त सरकार है जिनके लिए यह औद्योगिक विवाद अधिनियम,1947 के अर्न्तगत उपयुक्त सरकार है।

ठेका श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम, 1970

इस अधिनियम को कतिपय प्रतिष्ठानों मे ठेका श्रम के रोजगार को विनियमित करने तथा कतिपय परिस्थितियों में और उनसे संबंधित मामलों के लिए इसके उन्मूलन का प्रावधान करने के लिए अधिनियमित किया गया है। यह 20 या इससे अधिक ठेका श्रमिकों को नियुक्त करने वाले सभी प्रतिष्ठानों एवं ठेकेदारों पर लागू होता है। इस अधिनियम में इस अधिनियम के अभिशासन के परिणामस्वरुप उठने वाले मामलों पर संबंधित सरकारों को परामर्श देने के लिए केन्द्रीय एवं राज्य सलाहकार बोर्डों के गठन का प्रावधान किया गया है।

केन्द्र सरकार मे विभिन्न प्रकार के कार्यो,रोजगारों और प्रक्रियाओं जैसे खानों,भारतीय खाद्य निगम के गोदामों,बन्दरगाह न्यासों एवं अनेक अन्य उद्योगों/प्रतिष्ठानों जिनके लिए केन्द्र सरकार उपयुक्त सरकार है, में ठेका श्रम के रोजगार को प्रतिबन्धत करने बाली अनेक अधिसूचनाएं जारी की हैं। केन्द्रीय ठेक श्रम सलाहकार बोर्ड ने भी विभिन्न ठेका श्रम प्रणाली पर प्रतिबंध के मामले की जाँच का लिए अनेक समितियों का गठन किया है।

केन्द्र सरकार ऐसे उद्योगों और प्रतिष्ठानों के संबंध में उपयुक्त सरकार है जिनके लिए यह औद्योगिक विवाद अधिनियम,1947 के अर्न्तगत उपयुक्त सरकार है।

बाल श्रम (निरोध एवं विनियमन)अधिनियम,1986

यह अधिनियम कतिपय खतरनाक पेशों और प्रक्रियाओं में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित करता है और अन्य क्षेत्रों में उनके रोजगार को विनियमित करता है। केन्द्र सरकार के नियंत्रणाधीन प्रतिष्ठान अथवा रेलवे प्रशासन अथवा बडे बन्दरगाह अथवा खान अथवा तेल क्षेत्र के संबंध में उपयुक्त सरकार है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने रिट् याचिका (सिविल) संख्या 465/86 में दिनांक 10.12.1996 के अपने निर्णय में कतिपय निर्देश दिया है कि किस प्रकार खतरनाक रोजगार में कार्य कर रहे बच्चों को ऐसे रोजगारों से निकाला जाए और उन्हें पुनर्स्थापित किया जाए। उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्देशों में से एक बाल श्रम के सर्वेक्षण संचालन से संबंधित है। सर्वेक्षण कराने का मुद्दा केन्द्रीय श्रम मंत्री की अध्यक्षता में दिनांक 22.01.1997 को नई दिल्ली में आयोजित सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के श्रम मत्रियों, श्रम सचिवों एवं श्रम आयुक्त के सम्मेलन में विचार विमर्श के लिए आया। सम्मेलन में विचार विमर्श के बाद श्रम मंत्री द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय को कार्यान्वित करने हेतु राज्य सरकारों के लिए दिशा निर्देश जारी किए गए हैं।

औद्योगिक रोजगार (स्थाई आदेश) अधिनियम, 1946

इस अधिनियम द्वारा औद्योगिक प्रतिष्ठानों में नियोक्ताओं के लिए उनके अर्न्तगत रोजगार की स्थितियों को औपचारिक रूप से परिभाषित करना और अधिप्रमाणन प्राधिकारी के पास स्थाई आदेशों के प्रारूप को अधिप्रमाणित करने के लिए भेजना अपेक्षित बनाया गया है। यह ऐसे प्रत्येक प्रतिष्ठान पर लागू होता है जिसमें 100 (केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे प्रतिष्ठान के लिए इसे घटाकर 50 कर दिया गया है जिसके लिए वह उपयुक्त सरकार है।) अथवा इससे अधिक श्रमिको को नियुक्त किया गया है और केन्द्र सरकार अपने नियंत्रणाधीन प्रतिष्ठानों अथवा रेलवे प्रशासन अथवा बडे बन्दरगाह, खान अथवा तेल क्षेत्र के संबंध में उपयुक्त सरकार है । औद्योगिक रोजगार (स्थाई आदेश) अधिनियम, 1946 के अन्तर्गत सभी क्षेत्रीय श्रमायुक्तों (कें.) को केन्द्रीय क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले प्रतिष्ठानों के संबंध में स्थाई आदेशों को प्रमाणित करने के लिए प्रमाणन अधिकारी घोषित किया गया है। मुख्य श्रमायुक्त(कें.) तथा सभी उप मुख्य श्रमायुक्त(कें.) अधिनियम के अन्तर्गत अपीलीय प्राधिकारी घोषित किया गया है।

रेलवे कर्मचारी (कार्य के घंटे और विश्राम की अवधि) नियमावली, 2005

रोजगार के घंटे संबंधी विनियमन कारखाना, खान अधिनियम तथा इंडियन मर्चेन्ट शिपिंग अधिनियम द्वारा अधिशासित एंव विशिष्ट ऱूप से शामिल नहीं किए गए संस्थानों को छोडकर सभी संस्थानों पर लागू हैं। रोजगार के घंटे संबंधी विनियमनों में गहन, निरंतर, विशेष रुप से रुक कर और शामिल नहीं किए गए कार्यों की प्रकृति के अनुसार रेलवे श्रमिकों के वर्गीकरण का प्रावधान है।

यह कार्य के घंटों और विश्राम की अवधि को विनियमित करता है। वर्गीकरण से असंतुष्ट श्रमिक ऐसे मामलों पर निर्णय के लिए प्राधिकृत क्षेत्रीय श्रमायुक्तों के पास जा सकते हैं। प्राधिकरी के आदेश के विरुद्ध अपील श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष दायर की जा सकती है। संयुक्त सचिव अपीलीय प्राधिकारी हैं।

प्रसूति लाभ अधिनियम, 1961

यह अधिनियम बच्चे के जन्म से पूर्व और बाद में कतिपय अवधि के लिए कतिपय प्रतिष्ठानों में महिलाओं के रोजगार को विनियमित करता है और प्रसूति एवं अन्य लाभों का प्रावधान करता है।यह अधिनियम कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अर्न्तगत शामिल कर्मचारियों को छोडकर दस अथवा इससे अधिक व्यक्तियों को नियुक्त करने वाले सभी खानों ,कारखानों, सर्कस, उद्योग, प्लांटों, दुकानों एवं प्रतिष्ठनों पर लागू होता है।राज्य सरकारों द्वारा इसे अन्य प्रतिष्ठानों में भी लागू किया जा सकता है।अधिनियम के अन्तर्गत विस्तार के लिए कोई मजदूरी सीमा नहीं है। सर्कस उद्योग एवं खानों के संबंध में केन्द्र सरकार उपयुक्त सरकार है।

उपदाय संदाय अधिनियम,1972

यह अधिनियम खानों, कारखानों, कम्पनियों तथा दस इससे अधिक अधिक श्रमिकों को नियुक्त करने वाली दुकानों,प्रतिष्ठानों पर लागू है। इस अधिनियम में सेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष के लिए 15 दिनों की मजदूरी की दर से और अधिकतम दस लाख रु. के उपदान संदाय का प्रावधान है। मौसम के लिए सात दिनों की मजदूरी की दर से उपदान देय होता है।

इस अधिनियम में किसी भी अवार्ड अथवा इस अधिनियम सं नियोक्ता के साथ करार और ठेके के अन्तर्गत उपदान की बेहतर शर्तों को प्राप्त करने संबंधी कर्मचारी के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडता है। केन्द्र सरकार अपने अन्तर्गत अथवा अधिक राज्यों में शाखाओं वाले प्रतिष्ठान अथवा अपने अन्तर्गत नियंत्रणाधीन कारखाने के प्रतिष्ठान अथवा रेलवे प्रशासन अथवा बडे बन्दरगाह अथवा खान अथवा तेल क्षेत्र के संबंध में उपयुक्त सरकार है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम,1947

इस अधिनियम में औद्योगिक विवाद की जाँच और समाधान कतिपय अन्य उद्देश्यों के लिए प्रावधान और किए गए हैं। इसमें समाधान अधिकारियों के विशेष तंत्र,कार्य समितियों,जाँच न्यायालय, श्रम न्यायालयों, औद्योगिक न्यायाधिकरणों एवं राष्ट्रीय न्यायाधिकरणों का प्रावधान किया गया है और उनकी शक्तियों उनके कार्यो और उनके द्वारा अनुपालन की जाने वाली प्रक्रिया को परिभाषित किया गया है।

इसमें उन आकस्मिक स्थितियों जब विधिक रूप से हडताल अथवा तालाबंदी की जा सके,उन्हें अवैधानिक अथवा गैर कानूनी घोषित किया जाए, जब श्रमिकों की छंटनी, कटौती बर्खास्ती की जाए,परिस्थियाँ जब औद्योगिक प्रतिष्ठान को बन्द कर दिया जाए और अनेक अन्य मामले जो औद्योगिक कर्मचारियों और नियोक्ताओं से संबंधित का विस्तार से उल्लेख है।

केन्द्र सरकार निम्नलिखित द्वारा संचालित उद्योगों के लिए उपयुक्त सरकार हैः-

(क) केन्द्र सरकार के प्राधिकरण के अन्तर्गत अथवा द्वारा

(ख) रेलवे कम्पनी द्वारा

(ग)  इस उद्देश्य के लिए विनिर्दिष्ट नियंत्रित उद्योग

(घ)  इस अधिनियम की धारा 2(क) में उल्लिखित कतिपय उद्योगों के संबंध में आई आर परिवहन संवा अथवा बैंकिंग अथवा बीमा कम्पनी,खान,तेल क्षेत्र,छावनी बोर्ड अथवा बडा बन्दरगाह,कोई कम्पनी जिसमें कम से कम इक्यावन प्रतिशत पूंजीगत शेयर में हिस्सेदारी केन्द्र सरकार की हो,निगम जो इस खंड में उल्लिखित निगम नहीं हो और जो संसद द्वारा बनाए गए कानून द्वारा अथवा इसके अन्तर्गत स्थापित हो अथवा केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम सहायक कम्पनियाँ जो मुख्य उद्यम द्वारा स्थापित हो और स्वायत्त निकाय जो केन्द्र सरकार के स्वामित्व अथवा नियंत्रण के अधीन हों ।

राज्य सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम द्वारा स्थापित सहायक कम्पनियों तथा राज्य सरकार के स्वामित्व अथवा नियंत्रणाधीन स्वायत्त निकायों ,राज्य़ सरकार के साथ किसी अन्य औद्योगिक विवाद के संबंध में।

बशर्ते कि किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में ठेकेदार के माध्यम से नियुक्त ठेका श्रमिक के बीच विवाद की स्थिति में जहाँ ऐसा विवाद उठा हो, उपयुक्त सरकार ,जैसा मामला हो, होगा जिसका नियंत्रण ऐसे औद्योगिक प्रतिष्ठान पर हो।

अन्तर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक(रोज़गार और सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम, 1979

इस अधिनियम का अभिप्राय अन्तर राज्यीय प्रवासी श्रमिक के रोज़गार को विनियमित करना तथा उनकी सेवा शर्तों का प्रावधान करना है। यह प्रत्येक प्रतिष्ठान पर लागू होता है और ठेकेदार जो पाँच अथवा इससे अधिक श्रमिकों की नियुक्ति करता है, प्रत्येक अन्तर राज्यीय प्रवासी श्रमिक को अन्तर राज्यीय पास बुक प्रदान करेगा, जिसमें सभी ब्यौरे, मासिक मज़दूरी के 50% के समतुल्य अथवा 75/- रु जो भी अधिक हो विस्थापन भत्ता के भुगतान, यात्रा भत्ता के भुगतान जिसमें यात्रा की अवधि के दौरान मज़दूरी का भुगतान शामिल है। उपयुक्त आवासीय स्थान, चिकित्सा सुविधाओं और बचाव के कपड़े, मज़दूरी का भुगतान स्त्री-पुरुष के भेद-भाव के बिना समान कार्य के लिए समान वेतन आदि का ब्यौरा होगा। प्रतिष्ठान में अधिनियम के प्रावधान के प्रवर्तन के लिए मुख्य ज़िम्मेदारी केन्द्र सरकार और राज्य सरकार/संघ राज्य क्षेत्र की है, जिसके अन्तर्गत वह प्रतिष्ठान है।

भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक(रोज़गार एवं सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम, 1996

यह अधिनियम प्रत्येक उस प्रतिष्ठान पर लागू होता है जो किसी भवन अथवा अन्य निर्माण कार्य में 10 अथवा उससे अधिक श्रमिकों को नियुक्त करता है और जिसकी परियोजना लागत 10 लाख रु. से अधिक है। राज्य सरकारों द्वारा कल्याण बोर्डों के गठन और कोष के अन्तर्गत लाभग्राहियों के पंजीकरण तथा उनके पहचान कार्डों के प्रावधान आदि के अलावा कानून के अभिशासन के परिणामस्वरूप उठने वाले मामलों पर उपयुक्त सरकारों को परामर्श देने के लिए केन्द्रीय और राज्य सलाहकार समितियों के गठन का भी प्रावधान है। इन विधानों में रोज़गार और सेवा शर्तों, निर्माण श्रमिकों के लिए सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी उपायों के लिए राज्य स्तर पर कल्याण कोष की स्थापना, आदि का प्रावधान है।

श्रम कानून(कतिपय प्रतिष्ठानों द्वारा रजिस्टरों को रखने और प्रस्तुत करने की छूट) अधिनियम, 1996

इस अधिनियम में 19 व्यक्तियों तक नियुक्त करने वाले प्रतिष्ठानों के संबंध में नियोक्ताओं को श्रम कानूनों के अन्तर्गत रजिस्टरों को रखने और प्रस्तुत करने से छूट प्रदान करने का प्रावधान है।

स्रोत: भारत सरकार का श्रम विभाग

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सचिन सर्वटे
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय वंचित लोक मंच
मो-9468564466
Email-vanchitlokmanch@gmail.com

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